पहला स्वरूप मां शैलीपुत्री की आराधना आज
इस अवधि में अपने सुविधानुसार कभी भी कलश स्थापित कर सकते है। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:36 से 12:24 तक है। पुजारी बाबा बताते है कि नवरात्र में पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने से व्यक्ति को चंद्र दोष से मुक्ति मिल जाती है। हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा।
कथा के अनुसार दक्षप्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। उसमें समस्त देवताओं को आमंत्रित किया किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया। सती यज्ञ में जाने के लिए आतुर हो उठीं। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण यज्ञ में जाने से मना किया लेकिन सती के आग्रह पर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी।
वहां जाने पर सती का अपमान हुआ। इससे दुखी होकर सती ने स्वयं को यज्ञाग्नि में भस्म कर लिया। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ को तहस नहस कर दिया। वही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं।
दूसरी तरफ पूजा की तैयारी को लेकर बाजार में काफी चहल-पहल दिखी। लोग दुर्गा पूजा से संबंधित सामग्री खरीदने में मशगूल दिखे। जिसमें कलश,चौमुखी दीप, कपड़ा, फल, धूप, नारियल व अन्य सामाग्री की खरीदारी हुई। दिन भर लोगों की भीड़ लगी रही।
नवरात्र को लेकर पूजा समानो की खरीदारी करती श्रद्धालु।
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